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कल से पक्का - A Promise Never Fulfilled


हर रोज़ खुद से ये वादा करता हूँ, 
कल से पक्का ये सब नहीं करूँगा, 
कल से नया सवेरा होगा, नए पन्ने लिखूँगा,
कल से पक्का ऐसा नहीं रहूँगा
पर 4 पंक्तियां बाद, वही फ़रियादें करता हूँ, 
क्यों नहीं हुआ वैसा जैसे होना था, 
क्यों नहीं कहा उससे जिससे कहना था।
वो गलती है फिर भी वो गलती दोहरा रहा हूँ। 
अपने ही बुने माया जाल में उलझा जा रहा हूँ,
इस दर्द-ए-इश्क का बोझ बढ़ाता जा रहा हूँ।
कोई आओ और इस नादान मन को समझाओ,
जो भूल गया है खुद को, उसे राह दिखाओ।
अब बस कल का इंतजार नहीं, आज का वादा,
नहीं टूटेगा खुद से किया कोई भी इरादा।





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