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खुदगर्जी - Art of Self Love


बेजान शरीर में एक छोटा सा गुरूर है,
खुद से इश्क का अलग सा सुरूर है।
ऐसा नहीं है कि दूसरों को कम आंकते है, 
पर दूसरों को पहले रखने की वजह मांगते है।

किसी का मन बहलाने का अब चयन नहीं करते है,
खुद में खुद को व्यय करने की सनक रखते हैं।
और अनजाने में कहीं कोई हो जाए नाराज,
उस खबर की जाने में फिक्र नहीं रखते हैं।

अकेलापन नहीं, ये खुद की खोज है,
अंतर्मन की गहराई में, एक नई सोच है।
हर जख्म को सहलाकर, खुद को संवारा है,
खुद की रोशनी में, अब यह जग उजियारा है।

बाहर की चकाचौंध में, खोया था कभी,
पर अब अपनी ही राहों पर पिरो रहा हूं कहानी।
ये खुदगर्जी नहीं, इससे मैं आत्म-सम्मान मानता हूं,
खुद से प्यार करना, यही जीवन का सार है जानता हूं।




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